एक संवेदनशील कविता और जीवन का सबक

सपनों का शहर उजड़ गया ,
कुछ नंबर से मैं फिर पिछड़ गया।
क्या यह मेरी नाकामयाबी है,
या फिर मेरी किस्मत की साजिश है?
पिछले साल धांधली में फंस गया,
इस साल कठिन प्रश्नों में उलझ गया।
फिर घरवालों को क्या सफाई दूं?
या मौत को गले लगा लूं?
उठूं, पढ़ूं या खुद से लड़ूं,
मैं किस से प्रश्न करूं?
सब पूछते हैं इस साल क्या हुआ?
इस प्रश्न से मेरी तो उम्मीद टूटी, दिल जार-जार हुआ।
मैंने तो पूरा साल दिया,
मर- मर कर मेहनत किया।
फिर मुझसे यह सवाल क्यों?
अरे नहीं निकला तो बवाल क्यों?
और अगर डॉक्टर नहीं बना तो क्या होगा,
ना पहाड़ टूटेगा, ना जिंदगी थमेगा।
मैं इतना कमजोर नहीं जो एक परीक्षा से हार जाऊं,
अपनी जिंदगी दांव पर लगाऊं।
कह दूंगा कुछ और कर लूंगा,
मम्मी-पापा सबको समझा दूंगा।

कविता से सबक – हार नहीं, हिम्मत की पहचान बने
यह कविता सिर्फ एक विद्यार्थी की भावनाओं को नहीं, बल्कि आज के लाखों युवाओं के संघर्ष, दबाव और मानसिक द्वंद्व को बयां करती है। परीक्षा में असफल होना, या मनचाहा परिणाम न आना जीवन का अंत नहीं, बल्कि नए रास्तों की शुरुआत हो सकती है।
परीक्षा की एक असफलता, जीवन की असफलता नहीं होती।
अभिभावकों की अपेक्षाएं होती हैं, पर वे आपके जीवन से बढ़कर नहीं होतीं।
हर किसी की सफलता की परिभाषा अलग होती है, और वह डॉक्टर या इंजीनियर बनने तक सीमित नहीं है।
अपने अंदर की आवाज सुनें, खुद को मौका दें, और आत्महत्या जैसे विकल्प को कभी न चुनें।
अगर रास्ता नहीं मिल रहा, तो खुद एक रास्ता बनाइए — यही आपकी असली जीत होगी।
लेखिका का संदेश
“बच्चों, मां-बाप के कुछ कह देने से जिंदगी खत्म नहीं होती। जिन माता-पिता ने आपकी हर जिद पूरी की, वे आपके सपनों का सम्मान भी जरूर करेंगे। अपनी तकलीफ को शेयर कीजिए, घुटिए मत।
जब हिम्मत जवाब देने लगे तो खुद से कहिए — मैं कमजोर नहीं, बस राह बदल रही है। जिंदगी से कीमती कुछ भी नहीं है।
हमें यह अनमोल जीवन मिला है — तो इसका कद्र कीजिए, संभालिए और फिर से उठ खड़े होइए।”
ममता जायसवाल
लेखिका शिक्षिका है
खरसिया (छत्तीसगढ़)

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