रायपुर से दिल्ली तक सब कुछ हार चुका है बेबस पिता; न चल पाता है मासूम, न खुद खा सकता है खाना
नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेंद्रगढ़। जहाँ एक तरफ पूरा देश प्रदेश दीयों की जगमगाहट, आतिशबाजी और दीपावली के जश्न में सराबोर है, वहीं भरतपुर जनपद क्षेत्र के ग्राम पंचायत जनुआ में एक ऐसा सच सीना चीर रहा है जो किसी भी संवेदनशील इंसान की आंखें नम कर दे। एक तरफ लोग अपने घरों में लक्ष्मी-गणेश की पूजा कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ एक पिता अपनी जिंदगी की जमापूंजी गंवाकर अपने 11 साल के बीमार बेटे की सांसों को बचाने के लिए शासन-प्रशासन की चौखट पर आंसू बहा रहा है।
यहाँ 11 साल का मासूम ओम दुबे जन्म से ही गंभीर बीमारी सेरेब्रल पाल्सी की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। वह न अपने पैरों पर चल सकता है, न खुद से बैठ सकता है और न ही अपने हाथों से एक निवाला खा सकता है। उसकी पूरी दुनिया बिस्तर तक सिमट कर रह गई है।


रायपुर से दिल्ली तक भटके, खत्म हो चुकी है पिता की सारी जमापूंजी
अपने कलेजे के टुकड़े को स्वस्थ देखने की जिद में पिता देवेंद्र कुमार द्विवेदी ने अपनी जिंदगी की हर एक पाई दांव पर लगा दी। कर्ज लेकर और सब कुछ बेचकर वे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के बड़े अस्पतालों की ठोकरें खा चुके हैं। डॉक्टरों के बड़े-बड़े दरवाजे खटखटाए, लेकिन भारी-भरकम खर्च के बाद भी जब जेब खाली हो गई और कोई राहत नहीं मिली, तो इस लाचार पिता के कदम रुक गए।
आज स्थिति यह है कि घर में चूल्हा जलना भी मुश्किल है और आगे के इलाज का रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका है।
शासन-प्रशासन से सीधी गुहार: मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री लें सुध
पीड़ित परिवार ने स्थानीय स्तर से लेकर स्वास्थ्य मंत्री और भरतपुर-सोनहत विधायक तक कई बार गुहार लगाई, लेकिन अब तक कोई ठोस मदद जमीन पर नहीं उतर पाई है। इस दीपावली पर, जब हर कोई अपने बच्चों के चेहरों पर मुस्कान देखना चाहता है, इस परिवार की उम्मीदें अब सीधे तौर पर प्रदेश के मुखिया और स्वास्थ्य महकमे पर टिकी हैं।
दर्द से भरी पिता की पुकार
हमने बेटे के इलाज के लिए अपनी जमापूंजी, सब कुछ खत्म कर दिया। रायपुर से दिल्ली तक कोई कसर नहीं छोड़ी। स्वास्थ्य मंत्री और विधायकों तक गुहार लगाई, पर अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है। इस दीपावली हमारी हाथ जोड़कर प्रदेश के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री से विनती है कि वे इस मामले में खुद आगे आएं, शासन स्तर पर सुध लें और मेरे बेटे का इलाज करवाकर हमारी इस दीपावली को अनमोल बना दें।
— देवेन्द्र कुमार द्विवेदी, (ओम दुबे के पिता)
क्या सिस्टम की नींद खुलेगी या बुझ जाएगा उम्मीद का आखिरी दीया ?
दीपावली का असली संदेश तभी सार्थक होता है जब हम अपने घरों के साथ-साथ किसी जरूरतमंद के जीवन में भी उजाला ला सकें। 11 वर्षीय ओम को एक बेहतर उपचार और सम्मानजनक जीवन का अवसर दिलाने के लिए अब सिर्फ आम जनता ही नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन को पूरी ताकत से आगे आना होगा।
क्या इस खबर के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री इस मासूम की सुधि लेंगे? क्या इस दीपावली पर ओम को सरकारी मदद का वह दीया मिलेगा जो उसके जीवन का अंधकार दूर कर सके? यह सवाल आज पूरे इलाके की जुबान पर है और हर कोई एक मसीहा के रूप में सरकार के कदम का इंतजार कर रहा है।
About The Author










































