
दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसमें प्यार, स्नेह और भरोसा शामिल होता है…
बिना किसी शर्त के, बिना किसी कारण के… बस दोस्त एक-दूसरे का साथ पसंद करते हैं।
बचपन की किताबों में दोस्ती पर एक कहानी पढ़ी थी… राम और श्याम की… शायद आपको भी याद हो…
कहानी शुरू होती है दोनों दोस्तों के एक गांव से दूसरे गांव जाने के साथ…
और दोनों गांव के बीच पड़ता था एक जंगल।
दोनों को उसी जंगल के बीच से होकर जाना था।
राम और श्याम ने तय किया कि दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर जंगल पार करेंगे,
जिससे उन्हें डर भी नहीं लगेगा और साथ भी बना रहेगा।

लेकिन वहां जंगल के बीचों-बीच उन्हें मिल गया एक भालू।
भालू को अपनी तरफ आता देख राम झट से पेड़ पर चढ़ गया
और श्याम को कुछ नहीं सूझा तो वो वहीं सांस रोक कर लेट गया।
भालू आया, श्याम को देर तक सूंघा, उसके आस-पास घूमा… और चला गया।
जब दोनों निश्चिंत हो गए कि अब वो सुरक्षित हैं,
तब राम पेड़ से नीचे उतरा और श्याम से पूछा –
“भालू ने भला तुम्हारे कान में क्या कहा?”
श्याम ने राम के कंधे पर हाथ रखा और बोला –
“भालू ने कहा कि जो तुम्हारा मुसीबत में साथ न छोड़े, वही सच्चा दोस्त होता है।”
ये कहकर श्याम मुस्कुराया और आगे बढ़ गया।
बचपन में सुनी या पढ़ी इस कहानी की छाप इतनी गहरी रही कि तय कर लिया
कि दोस्त को तो बस साथ होना चाहिए।
उसका साथ होना ही ज़रूरी होता है।
हम सबके अपने-अपने क्राइटेरिया हैं फ्रेंडशिप के, ख़ासकर आजकल…
लेकिन जब ज़िंदगी की व्यस्तताओं में उलझ जाओ,
तब कहीं एक कसक महसूस होती है कि दोस्त तो बस दोस्त होता है।
उसका आपके लिए होना ही बहुत है।
वो कैसा है, कैसा नहीं — इससे ज्यादा ज़रूरी
उसके साथ आपके वो पल हैं जो साथ बीते।
बल्कि मैं तो कहती हूं —
अच्छा-बुरा वक्त सब पर आता है, उससे भी कभी अपने दोस्त को मत तौलिए।
गिले-शिकवे बरकरार रखें,
बस दोस्ती के बीच तकरार और दरार को जगह न दें।
वरना चाहता तो श्याम भी राम से रूठ सकता था,
झगड़ सकता था…
लेकिन वो बस मुस्कुराया और आगे बढ़ गया।


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