रक्षाबंधन के अगले दिन बहन का निधन, भाई-बहू ने निभाया वचन मेकाज को दान किया पार्थिव शरीर व्याख्याता सुश्री अहिल्या कोमरे की अंतिम इच्छा पूरी, मेडिकल छात्रों के अध्ययन में आएगा देह का उपयोग


नई पहल न्यूज नेटवर्क। जगदलपुर। रक्षाबंधन के पावन त्योहार पर जहां भाई-बहन के रिश्ते को रक्षा और प्रेम की डोर से बांधा जाता है, वहीं जगदलपुर के कोमरे परिवार ने इस रिश्ते को नई परिभाषा दी। रक्षाबंधन के अगले ही दिन जब बड़ी बहन सुश्री अहिल्या कोमरे (56) का निधन हुआ, तो उनके छोटे भाई एम.आर. कोमरे और भाभी सबत कोमरे ने उनका वह अधूरा सपना पूरा किया, जो वे जीवन भर कहती रहीं — “मेरा पार्थिव शरीर किसी के काम आना चाहिए।” अहिल्या कोमरे, जो कांकेर जिले के कोरर के कोपानपुर हाई स्कूल में व्याख्याता के पद पर पदस्थ थीं, पिछले दो वर्षों से गंभीर बीमारी के चलते जगदलपुर के अवंतिका कॉलोनी स्थित अपने भाई के घर रह रही थीं। रक्षाबंधन के दिन भी उन्होंने अपने भाई से बातें कीं और दिन साथ बिताया। लेकिन अगले ही दिन, 10 अगस्त को उनका निधन हो गया। उनकी इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उनका शरीर मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी के डॉक्टर और मेडिकल छात्र पढ़ाई में इसका उपयोग कर सकें। भाई एम.आर. कोमरे और भाभी सबत कोमरे ने इस वचन को निभाते हुए सोमवार शाम को मेकाज, डिमरापाल को उनका पार्थिव देह सौंप दिया।
मानवता की मिसाल

सुश्री अहिल्या कोमरे कबीर पंथी संतराम पाल जी महाराज संस्था से जुड़ी थीं और जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने अंगदान और देहदान को मानव सेवा का सर्वोच्च रूप माना। छोटे भाई एम.आर. कोमरे ने भी कुछ माह पहले ही अपना देहदान फॉर्म भरकर संकल्प लिया था।
उनका यह कदम न केवल परिवार के लिए गर्व का विषय है, बल्कि समाज में मानवता और सेवा की प्रेरणा देने वाला उदाहरण भी है।
एम.आर. कोमरे का कहना है
दीदी हमेशा कहती थीं कि जीवन के बाद भी दूसरों के काम आना ही सच्ची सेवा है। आज उन्हें खोने का दुख है, लेकिन उनका सपना पूरा करने की तसल्ली भी है।


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