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छठ पर्व : जहाँ न पुजारी की ज़रूरत ! लोक आस्था का महापर्व, व्रती ही पुरोहित और यजमान, सीधे सूर्य से संवाद की अनूठी परंपरा

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36 घंटे का निर्जला व्रत, व्रती स्वयं निभाते हैं हर रस्म, सादगी ही इस पर्व की सबसे बड़ी शक्ति

नई पहल न्यूज डेस्क। भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक पटल पर छठ पूजा एक ऐसा अनूठा महापर्व है, जो पुरोहितवाद और जटिल कर्मकांडों की जंजीरों से पूरी तरह मुक्त है। यह पर्व सीधे-सीधे भक्त और ‘प्रत्यक्ष देवता’ सूर्य के बीच संवाद की अलौकिक गाथा है। न किसी विशेष मंत्र की दरकार, न किसी पंडित या पुजारी की मध्यस्थता की आवश्यकता! छठ की हर प्रक्रिया में व्रती (व्रत रखने वाला) स्वयं ही पुरोहित होता है और लोक आस्था के बल पर यह कठिन अनुष्ठान पूर्ण होता है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, पवित्रता और आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा है, जो इसे देश के अन्य पर्वों से एकदम अलग और खास बनाती है।

सूर्य की प्रत्यक्ष उपासना, मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं

​छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें व्रती भगवान सूर्य की सीधी उपासना करते हैं। सनातन धर्म में सूर्य देव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जो हर दिन प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। यही कारण है कि इस पर्व में भक्त और ईश्वर के बीच सीधा संबंध स्थापित होता है। विद्वानों के अनुसार, जब संवाद प्रत्यक्ष हो, तो किसी मध्यस्थ (पंडित या पुजारी) की भूमिका गौण हो जाती है। यह पर्व शुद्धता, सादगी और आत्म-विश्वास पर टिका है, जहाँ व्रती के मन के भाव और उनकी अटूट आस्था ही सबसे बड़ा विधान बन जाते हैं।

खुद ही यजमान, खुद ही पुरोहित

​चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व नहाय-खाय से लेकर खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य तक, हर कदम पर लोक आस्था और भक्ति की भावना से संचालित होता है। व्रती महिलाएँ (या पुरुष) स्वयं ही पूरे विधि-विधान का पालन करती हैं। ठेकुआ बनाने से लेकर अर्घ्य के सूप को सजाने तक, हर कार्य में स्वयं व्रती और उनके परिवारजन लगे होते हैं। यहाँ कोई जटिल मंत्रोच्चार नहीं होता, बल्कि शुद्ध भावना के साथ सूर्यदेव को जल अर्पित किया जाता है। इस सरलता ने छठ पूजा को सामाजिक समानता का भी प्रतीक बना दिया है, जहाँ जात-पात और आर्थिक स्थिति से परे, हर कोई एक ही घाट पर एक समान श्रद्धा से पूजा करता है।

वेदों में भी उल्लेख, पर जोर लोक परंपरा पर

भले ही ऋग्वेद में भी छठ पूजा का उल्लेख और कुछ मंत्रों का जिक्र मिलता है, लेकिन इसका मुख्य आधार लोक परंपरा और कठिन तपस्या ही है। व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत रखकर जिस आत्मसंयम, स्वच्छता और अनुशासन का पालन करते हैं, वही इस पर्व का वास्तविक ‘विधान’ है। छठ पूजा का यह स्वरूप समाज को यह संदेश देता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए आडंबर नहीं, बल्कि सच्ची निष्ठा और पवित्रता सबसे ज़रूरी है।

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