छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग का बहुचर्चित ‘युक्तीकरण’ अभियान अब आम शिक्षकों के लिए एक कड़वा घूंट और रसूखदारों के लिए मनचाही पदस्थापना का जरिया बनता दिख रहा है। बड़े-बड़े नियमों और सख्ती के दावों के साथ लागू की गई यह प्रक्रिया कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई है। जहां एक ओर निष्ठावान शिक्षक दूर-दराज के इलाकों में प्रशासनिक आदेश मानकर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पहुंच वाले शिक्षक प्रशासनिक गलियारों से अपने संशोधन और तबादले करवा रहे हैं।
अपीलें खारिज, हाईकोर्ट से झटका, फिर भी मनचाहा तबादला: केस स्टडी
इस पूरी व्यवस्था की पोल खोलता एक ताजा मामला एम.सी.बी. (मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर) और सरगुजा जिले से सामने आया है, जो स्कूल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
- जून 2025 (युक्तीकरण पदस्थापना): सबिता गुप्ता (सहायक शिक्षक) को युक्तीकरण के तहत प्राथमिक शाला चैनपुर (विकासखंड मनेन्द्रगढ़) से स्थानांतरित कर अति-संवेदनशील व दूरस्थ क्षेत्र प्राथमिक शाला कोईलरा (विकासखंड भरतपुर) भेजा गया।
- अपील और खारिज की प्रक्रिया: आदेश से असंतुष्ट शिक्षिका ने जिला, संभागीय और राज्य स्तरीय समितियों में अभ्यावेदन दिया। सभी स्तरों पर आवेदन खारिज कर दिए गए।
- हाईकोर्ट से भी राहत नहीं: मामला न्यायालय पहुंचा, लेकिन माननीय उच्च न्यायालय ने भी याचिका को खारिज कर प्रशासनिक आदेश को सही ठहराया।
- संभाग आयुक्त का आदेश (22 जुलाई 2026): तमाम अपीलों और न्यायिक आदेशों के खारिज होने के बावजूद, सरगुजा संभाग आयुक्त कार्यालय द्वारा 22/07/2026 को पदस्थापना संशोधन का आदेश जारी हुआ।
- मात्र 15 दिन में अंतर्जिला स्थानांतरण: संशोधन के महज दो हफ्ते बाद जारी नई स्थानांतरण सूची में उक्त शिक्षिका का तबादला एम.सी.बी. जिले से सीधे सरगुजा जिला कर दिया गया।
सिस्टम के दोहरे रवैये पर तीन तीखे सवाल
- ईमानदारी की सजा क्यों? उन सैकड़ों निष्ठावान शिक्षकों का क्या कसूर है, जिन्होंने सरकार के युक्तीकरण आदेश को सहर्ष स्वीकार किया और आज अपने घर-परिवार से 150 से 200 किलोमीटर दूर जाकर विषम परिस्थितियों में सेवाएं दे रहे हैं?
- क्या नियम सिर्फ ‘आम’ शिक्षकों के लिए हैं? जब जिला, संभाग, राज्य समिति और हाईकोर्ट तक से आवेदन खारिज हो चुके हों, तब ऐसा कौन सा ‘विशेष प्रशासनिक आधार’ बन जाता है जिससे रातों-रात संशोधन और फिर अंतर्जिला तबादला हो जाता है?
- युक्तीकरण की मूल भावना का क्या हुआ? यदि अंततः प्रभाव और रसूख के बल पर ही पदस्थापना तय होनी थी, तो युक्तीकरण के नाम पर महीनों चले इस भारी-भरकम नाटक और करोड़ों के प्रशासनिक समय को बर्बाद करने का क्या औचित्य था?
शिक्षा विभाग की इस कार्यशैली ने पूरे प्रदेश के शिक्षकों के मनोबल को चोट पहुंचाई है। जब तक नियमों का पालन सभी के लिए समान रूप से नहीं होगा, तब तक युक्तीकरण जैसे अभियानों की साख पर ऐसे ही सवाल उठते रहेंगे।
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