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छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के अधिकारों पर ‘डाका’: ठेकेदारों के चंगुल में 1.58 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र !

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नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र; वन अधिकार कानून के खुले उल्लंघन पर सीधे हस्तक्षेप की मांग

नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर। छत्तीसगढ़ में जल, जंगल और जमीन के असली हकदारों को उनके ही अधिकारों से महरूम कर बंधुआ मजदूर बनाने का एक बड़ा और बेहद गंभीर मामला सामने आया है। राज्य की भाजपा सरकार पर वन अधिकार अधिनियम (FRA) की सरेआम धज्जियां उड़ाने का आरोप लगाते हुए विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने सीधे देश की महामहिम राष्ट्रपति का दरवाजा खटखटाया है।

​डॉ. महंत ने राष्ट्रपति को एक बेहद तल्ख और तथ्यात्मक अर्धशासकीय पत्र (पत्र क्र. 341/ने.प्र./26) लिखकर राज्य के 50 हजार से अधिक आदिवासी और वन निवासी परिवारों को उनके कानूनी हक से वंचित करने की साजिश का पर्दाफाश किया है। उन्होंने मांग की है कि छत्तीसगढ़ में वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) को तत्काल प्रभाव से लागू कराने के लिए राज्यपाल और मुख्यमंत्री को कड़े निर्देश जारी किए जाएं।

तथ्यों की जुबानी: आदिवासियों का हक छीनकर ‘पूंजीपतियों’ को फायदा !

​नेता प्रतिपक्ष ने अपने पत्र में राज्य की वर्तमान मछली नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने जो चौंकाने वाले आंकड़े और तथ्य सामने रखे हैं, वे इस प्रकार हैं:

  • 1.58 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र पर ‘कब्जा’: छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों में लगभग 1.58 लाख हेक्टेयर का विशाल जलक्षेत्र मौजूद है।
  • ठेकेदारों के रहमोकरम पर 50,000 परिवार: इन जलाशयों पर मछली पालन कर अपनी आजीविका चलाने वाले 50 हजार से अधिक स्थानीय आदिवासी परिवार आज बाहरी ठेकेदारों के अधीन मजदूर बनने को मजबूर हैं।
  • मछली नीति बनाम कानून: केंद्र सरकार का वन अधिकार कानून (2006) कहता है कि इन जलक्षेत्रों पर स्थानीय समुदाय का हक होगा। लेकिन राज्य सरकार की वर्तमान मछली नीति इस कानून के बिल्कुल विपरीत है।
  • टेंडर का खेल: नियमों को ताक पर रखकर 1000 हेक्टेयर से बड़े जलाशयों को खुले बाजार में टेंडर और निविदाएं निकालकर बाहरी ठेकेदारों के हवाले किया जा रहा है।

18 सालों से लटका है कानून, मूल निवासी बन गए ‘मजदूर’

​”यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो कानून दिसंबर 2007 से पूरे देश में लागू है, उसकी धारा 3(1)(घ) को पिछले 18 वर्षों में भी छत्तीसगढ़ में सही ढंग से लागू नहीं किया गया। हमारे मूल निवासी, जो इस जल और जमीन के मालिक होने चाहिए थे, वे आज अपने ही घर में ठेकेदारों के गुलाम बनकर रह गए हैं।”

डॉ. चरणदास महंत, नेता प्रतिपक्ष

राष्ट्रपति के संज्ञान पर जताया आभार, अब ‘एक्शन’ की उम्मीद

​डॉ. चरणदास महंत ने इस संवेदनशील और गंभीर मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के लिए राष्ट्रपति महोदया के प्रति आभार भी जताया है। उन्होंने कहा कि महामहिम का इस विषय पर संज्ञान लेना लोकतांत्रिक मूल्यों और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के प्रति उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।

​डॉ. महंत ने उम्मीद जताई है कि देश के सर्वोच्च कार्यालय (राष्ट्रपति भवन) से निर्देश मिलने के बाद गहरी नींद में सोई छत्तीसगढ़ सरकार, यहां के राज्यपाल और मुख्य सचिव मामले की गंभीरता को समझेंगे। अब देखना यह है कि इस कड़े पत्र के बाद सरकार अपनी ‘ठेकेदार-हितैषी’ नीति बदलती है या आदिवासियों को अपने हक के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा।

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