
अक्सर अंग्रेज़ी भाषा में लोग अहंकार को केवल ‘Ego’ समझ लेते हैं, जबकि भगवद् गीता में इसका शाब्दिक अर्थ बताया गया है — “मैं-निर्माता”।
अर्थात् सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, लेकिन अहंकार से मोहित व्यक्ति यह सोचता है — “मैं ही कर्ता हूँ”।
कहानी से समझिए अहंकार का अर्थ

एक संन्यासी किसी राजा के पास गया। राजा ने उसका आदर-सत्कार किया, लेकिन न तो भोजन परोसने की ज़रूरत समझी और न ही विश्राम के लिए आग्रह किया।
जाते समय संन्यासी ने राजा से उपहार मांगा। राजा ने पूछा — “बताइए आपको मेरे खजाने से क्या चाहिए?”
संन्यासी ने कहा — “खजाना तुम्हारे राज्य का है, तुम केवल उसके संरक्षक हो। जिस महल में तुम रहते हो, वो भी प्रजा का है।”
राजा बोला — “तो महाराज, ऐसा क्या है जो मेरा है और आपको देने योग्य है?”
संन्यासी ने उत्तर दिया — “अगर सच में कुछ देना चाहते हो, तो अपना अहं दे दो। अहंकार यश का नाश करता है। तुम्हारा आतिथ्य दर्शाता है कि तुम दयालु हो, लेकिन अहंकार व्यक्ति को दूसरों से श्रेष्ठ मानने पर मजबूर करता है।”
राजा ने यह बात दिल से स्वीकार की और वचन दिया कि वह अपने भीतर से अहंकार को त्याग देगा।
अहंकार के नुकसान
अहंकार हमें दूसरों से अलग करता है और ईर्ष्या, क्रोध व घृणा की ओर ले जाता है। इस्लाम में माना गया है कि शैतान पहले अल्लाह का सबसे बड़ा भक्त था, लेकिन अहंकार के कारण स्वर्ग से निकाल दिया गया और नरक भेजा गया।
अहंकार व्यक्ति को अपनी गलतियों को देखने और उनसे सीखने से रोकता है, जिससे जीवन में संघर्ष बढ़ता है।


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