नदी किनारे मिला दो-तीन दिन के नवजात का शव, ‘मासूमियत के हत्यारे’ कौन ? MCB पुलिस रिकॉर्ड्स खंगालने में जुटी

नई पहल न्यूज नेटवर्क। मनेंद्रगढ़। 12 अक्टूबर 2025। यह किसी कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि उस भयानक सच्चाई का सामना है, जिसने आज एक बार फिर सवाल खड़ा किया है: क्या इंसान इतना निर्मम हो सकता है? आज सुबह, एमसीबी जिले के ताराबहरा गाँव की केवई नदी उस क्रूरता की मूक गवाह बनी, जिसने माँ और संतान के पवित्र रिश्ते को तार-तार कर दिया। नदी में तैरता मिला दो से चार दिन के एक नवजात शिशु का शव। वह मासूम, जिसने अभी ठीक से आँखें भी नहीं खोली होंगी, उसे ज़िंदगी देने वाले हाथों ने ही मृत्यु की अंधी धारा में धकेल दिया।
केवई नदी के किनारे पसरा सन्नाटा और आक्रोश
सुबह का शांत माहौल उस पल हड़कंप और सदमे में बदल गया, जब मछली पकड़ने आए ग्रामीणों ने नदी में जीवन के सबसे कोमल अंश को बेजान तैरते देखा। यह दृश्य केवल आँखों को नहीं, बल्कि कलेजे को चीर देने वाला था। जैसे ही जिला पंचायत सदस्य अनीता सिंह को इस दिल दहला देने वाली वारदात की सूचना मिली, वह तत्काल मौके पर पहुँचीं। उनके साथ पहुँची केल्हारी पुलिस ने नदी से उस ‘अभागन’ बच्चे का शव बाहर निकाला। अनीता सिंह ने नम आँखों से कहा, “जिस नदी को हम जीवनदायिनी मानते हैं, आज उसी ने मानवता के पतन का सबसे वीभत्स प्रमाण दिखाया है। यह बच्चा किसी का भविष्य था। दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
कोमल जिस्म पर निर्मम सवाल
पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पंचनामा किया है। प्रथम दृष्टया पोस्टमार्टम से पता चलेगा कि बच्चे का लिंग क्या था और मौत का कारण क्या था। पर सवाल यह नहीं है कि मौत कैसे हुई, सवाल यह है कि क्यों हुई?
कौन थी वह पत्थर दिल माँ या कौन था वह क्रूर परिवार, जिसने उस नन्ही जान को दुनिया की रौशनी भी नहीं देखने दी ?
क्षेत्र में भयंकर आक्रोश है। ग्रामीणों की संवेदनाएं उमड़ पड़ी हैं। हर आँख नम है और हर जुबान पर दोषियों के लिए सख्त सजा की मांग है।
केल्हारी थाना प्रभारी ने आश्वासन दिया है कि मामले की गहनता से जांच की जा रही है। अब पुलिस की टीमें सिर्फ गाँव में पूछताछ तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि आसपास के सभी स्वास्थ्य केंद्रों, निजी क्लीनिकों और प्रसूता रिकॉर्ड्स को खंगालेंगी। पुलिस का संकल्प है कि इस मासूमियत के हत्यारों को खोज निकाला जाएगा और उन्हें उनके अमानवीय अपराध की कीमत चुकानी होगी।
यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे समाज में ‘ममता’ की परिभाषा कितनी बदल गई है। नदी के पानी में बहता यह शव सिर्फ एक लाश नहीं, बल्कि समाज के नैतिक पतन का एक चीख़ता हुआ सबूत है।




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