मुख्य परीक्षा के लिए मिले कम से कम 100 दिन का समय, नेता प्रतिपक्ष ने राज्यपाल को लिखा पत्र
नई पहल न्यूज नेटवर्क। रायपुर|छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने लोक सेवा आयोग (PSC) के अभ्यर्थियों के भविष्य को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। डॉ. महंत ने राज्यपाल को पत्र लिखकर इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मुख्य परीक्षा की तैयारी के लिए दिया जा रहा समय अपर्याप्त है और यह परीक्षार्थियों के साथ अन्याय है।
तैयारी के लिए मात्र 51 दिन ‘नैसर्गिक न्याय’ के विरुद्ध
डॉ. महंत ने सरकार और आयोग प्रबंधन को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से यह स्वस्थ परंपरा रही है कि प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम और मुख्य परीक्षा के बीच कम से कम 100 दिनों का अंतराल दिया जाता था।
इस वर्ष 25 मार्च को परिणाम जारी हुए और 16 मई से परीक्षा निर्धारित कर दी गई। अभ्यर्थियों को केवल 51 दिन का समय देना उनके मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य के साथ खिलवाड़ है। विस्तृत पाठ्यक्रम को कवर करने और उत्तर लेखन के अभ्यास के लिए 100 दिन का समय नितांत आवश्यक है।
— डॉ. चरणदास महंत, नेता प्रतिपक्ष
शुल्क वापसी की पेचीदा प्रक्रिया पर उठाए सवाल
नेता प्रतिपक्ष ने परीक्षा शुल्क वापसी की वर्तमान व्यवस्था को “जटिल और उबाऊ” करार दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि:
- अभ्यर्थियों से बार-बार बैंक जानकारी मांगना बंद किया जाए।
- जिस खाते से फॉर्म भरते समय भुगतान हुआ था, परीक्षा में उपस्थित होने पर शुल्क स्वतः उसी खाते में वापस आना चाहिए।
- ऑनलाइन औपचारिकताओं के नाम पर युवाओं को परेशान करना बंद हो।
संवैधानिक गरिमा और युवाओं का विश्वास
डॉ. महंत ने जोर देकर कहा कि लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसकी कार्यप्रणाली पारदर्शी और युवाओं में विश्वास जगाने वाली होनी चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री और आयोग के अध्यक्ष से अनुरोध किया है कि स्थापित परंपराओं को न तोड़ें।
मुख्य मांगें एक नजर में:
- परीक्षा तिथि में बदलाव: मुख्य परीक्षा की तिथि आगे बढ़ाकर तैयारी के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।
- प्रक्रिया का सरलीकरण: शुल्क वापसी की प्रक्रिया को पारदर्शी और सरल बनाया जाए।
नेता प्रतिपक्ष ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि प्रदेश का युवा ही छत्तीसगढ़ का भविष्य है और उनके साथ हो रहे अन्याय को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब देखना यह है कि राजभवन और सरकार इस गंभीर विषय पर क्या रुख अपनाते हैं।
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